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विश्व हिंदू परिषद के 56 वर्ष पूरे, हिंदूओं की आवाज के रूप में हमेशा आगे रहा है विहिप
August 12, 2020 • ब्यूरो रिपोर्ट - न्यूज ऑफ फतेहपुर

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक दादासाहेब आप्टे ने समाजिक हित में अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को एक बैठक के लिए बुलाया। यह बैठक 29 अगस्त 1964 को जन्माष्टमी के अवसर पर मुंबई के पवई स्थित स्वामी चिनमयानन्द के आश्रम सांदीपनि साधनालय में बुलाई गई। इसमें चिनमयानन्द, तुकडो महाराज, सिख संप्रदाय से मास्टर तारा सिंह, जैन संप्रदाय से सुशील मुनि, गीता प्रेस गोरखपुर से हनुमान प्रसाद पोद्दार, केएम मुंशी और गुरुजी सहित 40-45 अन्य लोग भी उपस्थित थे। इसी दिन विश्व हिंदू परिषद के गठन की घोषणा की गई। 

इसी बैठक में हिंदू समाज को संगठित और जागृत करने, उसके स्वत्वों, मानबिंदुओं और जीवन मूल्यों की रक्षा व संवर्धन करने और विदेश में रह रहे हिंदुओं से संपर्क स्थापित कर उन्हें सुदृढ़ बनाने व उनकी सहायता करने संबंधित विश्व हिंदू परिषद के तीन मुख्य उद्देश्य तय किए गए। हिंदू की परिभाषा तय करते हुए कहा गया कि 'जो व्यक्ति भारत में विकसित हुए जीवन मूल्यों में आस्था रखता है या जो व्यक्ति स्वयं को हिंदूकहता है वह हिंदू है।


पहली बार विश्व हिंदू सम्मेलन प्रयाग में आयोजित किया गया

22 से 24 जनवरी 1966 को कुंभ के अवसर पर 12 देशों के 25 हजार प्रतिनिधियों की सहभागिता के साथ पहली बार विश्व हिंदू सम्मेलन प्रयाग में आयोजित किया गया। 300 प्रमुख संतों की सहभागिता के साथ पहली बार प्रमुख शंकराचार्य भी एक साथ आए और धर्मांतरण पर रोक व घरवापसी का संकल्प लिया गया। मैसूर के महाराज चामराज वाडियार को अध्यक्ष व दादासाहब आप्टे को पहले महामंत्री बनाकर विहिप की प्रबंध समिति की घोषणा भी हुई। इस सम्मेलन में जहां घरवापसी को मान्यता देने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ वहीं विहिप के बोध वाक्य 'धर्मो रक्षति रक्षितः' और बोध चिह्न  'अक्षय वटवृक्ष' भी तय हुआ।

सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ

बाबा साहिब डॉ भीमराव अंबेडकर का मानते थे कि यदि देश के संत महात्मा मिलकर यह घोषित कर दें कि हिंदू धर्म-शास्त्रों में छुआछूत का कोई स्थान नहीं है, तो इस अभिशाप को समाप्त किया जा सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए 13-14 दिसंबर 1969 के उडुपी धर्म संसद में संघ के तत्कालीन सर-संघचालक गुरूजी के विशेष प्रयासों के परिणाम स्वरूप, भारत के प्रमुख संतों ने एक स्वर से 'हिन्दव: सोदरा सर्वे, ना हिंदू पतितो भवेत् के उद्घोष के साथ सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया।