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तो क्या वीपी सिंह ने सीवर लाइन का शिलान्यास मन्दिर की जमीन पर किया था
October 19, 2020 • ब्यूरो रिपोर्ट - न्यूज ऑफ फतेहपुर • उत्तर प्रदेश

तो क्या वीपी सिंह ने सीवर लाइन का शिलान्यास मन्दिर की जमीन पर किया था

समझ से परे है बाके बिहारी जी मंदिर की जमीन के कब्जेदारो को बख्शना और सार्वजनिक मार्ग, भूमिधरी जमीन, कब्रस्तान पर चहार दिवारी का प्रशासनिक निर्णय

मंदिर की गुम जमीन को नहीं ढूंढ पा रहा है राजस्व विभाग, दूसरो की जमीन से भरपाई की कवायद

बड़ी कानूनी फजीहत का सबब बनना तय, तो फ़िर सूखेगी हलक

फतेहपुर। क्या तक़रीबन तीन दशक पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने यहां सीवर लाइन का शिलान्यास एक मंदिर की जमीन पर किया था...! अगर ऐसा था तो तत्कालीन जिला प्रशासन के जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और अगर वीपी ने सरकारी जमीन पर शिलान्यास किया था तो मौजूदा प्रशासन के जिम्मेदारों से जवाब तलब होना चाहिए कि शिलान्यास स्थल, कब्रिस्तान समेत कईयों की भूमिधरी जमीन को आज कैसे बाके बिहारी (नारायन दास कुटी) मन्दिर की जमीन बताकर उस पर अधिपत्य क्यों जमाया जा रहा है..! सवाल यह भी बड़ा है कि मन्दिर की जमीन पर दशकों से कब्ज़ा करके बैठे प्रभावशाली लोगों पर कार्यवाही कब, आखिर कब इनके अवैद्य निर्माण पर बुलडोजर चलेगा...! क्या प्रशासन इस मद में गंभीर होगा...!
उल्लेखनीय है कि शहर के शांतिनगर इलाक़े की बंजर/ऊसर जमीन (गाटा संख्या 2857) पर पीएम रहते वीपी सिंह ने 1990 में अपने ड्रीम प्रोजेक्ट सीवर लाइन के लिए शिलान्यास किया था, जहा पर बाकायदे चबूतरा बनवा कर काम शुरू होने से पहले ही सरकार गिर गई और यह प्रोजेक्ट समय के गर्त में समा गया। इसी स्थल के निकट सदियों पुराना बाके बिहारी जी का भव्य मंदिर है। सरकारी दस्तावेजों (1962 की  के मुताबिक इस मंदिर की यहां पर 09 बीघा 16 बिस्वा जमीन थी, जबकि इसी मंदिर की 01 बीघा 04 बिस्वा (गाटा संख्या 2386 व 2388) जमीन और कहीं है। मंदिर की 09 बीघा 16 बिस्वा जमीन के बडे़ हिस्से पर दशकों पहले कब्जे/बैनामे हो चुके हैं। क्योंकि बैनामा से पहले जिला जज से किसी प्रकार की इजाजत नहीं ली गई, इसलिए कानूनन बैनामो का कोई अस्तित्व नहीं माना जा सकता है ...! लगभग दो वर्ष पूर्व यहां के डीएम बनकर आए आंजनेय कुमार सिंह ने इस मंदिर को भव्य स्वरूप देने की जब ठानी तो कई रहस्यों पर से पर्दा उठने लगे। उन्होने माना कि मंदिर स्थल से लगी जमीन पीछे तालाब तालाब तक है। तालाब के ठीक बगल में स्थित मार्ग सार्वजनिक है, इससे मंदिर का कोई लेना देना नही है। 
     बताते हैं कि तत्कालीन डीएम की पड़ताल में काफ़ी कुछ स्पष्ट हो गया था कि मंदिर के मुख्य द्वार की ओर से दोनों ओर स्व. विजय शुक्ला, धर्मेन्द्र सिंह, राधेश्याम सिंह (दो मकान) के मकान और तालाब से जुड़कर लगे बीएसएनएल के मोबाइल टावर) का भूखण्ड जिसे जितेन्द्र लोधी अपना स्वामित्व बताते रहे है, वह पूरी की पूरी मंदिर की जमीन थी, जिसपर कब्ज़ा/बैनामा हुआ है, जो नियमानुसार गलत है। क्योंकि तत्कालीन सर्वराकर ने बैनामे से पूर्व जिला जज से इजाजत नहीं ली थी, इसलिए बैनामो का अस्तित्व स्वतः समाप्त हो जाता है ...! क्योंकि इस मामले में गेंद प्रशासन के पाले में थी, इसलिए अवैद्य कब्जेदारो पर कडी कार्यवाही हो पाती इससे पहले ही आञ्जनेय सिंह का तबादला रामपुर हो गया। मंदिर की जमीनों पर जितना काम आञ्जनेय कर गए थे, उतने में ही निर्माण कार्य चलता रहा..!
 पिछ्ले दिनो मौजूदा प्रशासन ने इस मद में तेजी दिखाई और मंदिर के आगे के कब्जेदारो को तो जैसे बख़्श दिया गया और आश्चर्य जनक ढंग से मन्दिर के पीछे तत्कालीन तत्कालीन विधायक सैय्यद कासिम हसन की विधायक निधि से बनी सीसी रोड, वीपी सिंह द्वारा किए गए सीवर लाइन के शिलान्यास स्थल, कब्रिस्तान और गाटा संख्या 2843 की भूमि धरी जमीन को मंदिर की जमीन बताकर सारे दावों को ख़ारिज करते हुए चहार दिवारी का निर्माण कार्य शुरू करवा दिया। इस ताज़ा प्रशासनिक कार्यवाहीं से जहां एक ओर हड़कंप मच गया है, तो दूसरी ओर यह सवाल भी उठता है कि आखिर ये हो क्या रहा है।
 इन बडे़ सवालों का जवाब प्राशसनिक जिम्मेदारों के पास नहीं है कि 1962 की चकबंदी के मुताबिक़ जो भूमिधरी जमीन है, वह मंदिर की कैसे हो सकती है। सवाल यह भी कम गंभीर नहीं है कि क्या राजा मांडा ने मंदिर की जमीन पर शिलान्यास किया था, क्या विधायक निधि से मंदिर की जमीन पर सार्वजनिक मार्ग का निर्माण हुआ था, क्या मंदिर की जमीन पर कब्रिस्तान था ...! प्रशासन के ताजा निर्णय से जिस सार्वजनिक रास्ते को मंदिर की जमीन से गुजरने की बात कह कर बंद किया जा रहा हैं, वह लगभग दो सैकड़ा घरों का अकेला पहुंच मार्ग है, आखिर कौन सोचेगा कि ये लोग निकलेंगे कहां से ...!
 कुल मिलाकर प्राशसनिक जिम्मेदार मंदिर की कब्जे वाली और गुम लगभग एक बीघा चार बिस्वा जमीन की भरपाई के नाम पर ज्यादती की जा रही  हैं, इस सन्दर्भ में कोई भी सरकारी दस्तावेज जबरन अधिग्रहण की इस तरह इजाजत नहीं देते बावजूद इसके ज़िम्मेदार मौन है, जिससे मामले की गंभीरता को सहजता से समझा जा सकता है...! आज एक पीड़ित ने सवाल किया कि किसके पास जाएं और किसको अपना दर्द सुनाए, कौन सुनेगा हमारी..., यह वास्तव में अत्यंत गंभीर प्रश्न था, जिसका उत्तर सिस्टम के जिम्मेदारों को देना ही होगा, अन्यथा हाईकोर्ट में शायद जवाब देते नहीं बनेगा।