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सूबे में कायम जंगलराज  मौन साधे जिम्मेदार"कानून के राज की कर रहे बात
August 25, 2020 • ब्यूरो रिपोर्ट - न्यूज ऑफ फतेहपुर • उत्तर प्रदेश

 

घटनाओं ने पिछली सरकारों के रिकॉर्ड तोड़े!
 
बढ़ी घटनाएं,पत्रकारों के मामलों में थोथी बयान बाजी करती प्रदेश सरकार,कभी नहीं उठाए सार्थक कदम!

जान जोखिम में डालकर सच्चाई उजागर करने वाले पत्रकारों का जब यह हाल तो आम जनता क्या करे

अपने में मस्त कर्ताधर्ताओं ने लोगों को भ्रष्टाचार व बदहाली में जीने के लिए छोड़ा                                                

फतेहपुर।पत्रकारिता सरल दिखने वाला लेकिन अत्यंत दुरूह कार्य है।* समाज में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करना हो या फिर शासन सत्ता को उनके कर्तव्यों का भान कराना हो या फिर आमजन की समस्या व पीड़ा को शासन-प्रशासन तक पहुंचाना हो!जान जोखिम में डालकर सोई हुकूमत एवं शासन सत्ता को जगाने का काम पत्रकार करता है। बलिया में पत्रकार रतन सिंह की गोली मारकर की गई हत्या कोई नई बात नहीं है।इसके पहले भी पत्रकारों पर हमले हुए हैं। फर्जी मुकदमे लगे हैं और हत्याएं तक हुई हैं एक ओर जहां शासन-प्रशासन के अधिकारी अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर विकासकारी योजनाओं को समाज के अंतिम छोर तक खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने का काम करते हैं उससे भी कहीं अधिक जिम्मेदारी का काम पत्रकार उनकी चेतना व हक हुकूक को जगा कर करते हैं लेकिन इसके बदले उन्हें आखिर मिलता क्या है? खामियां उजागर करने पर पत्रकारों पर कोई सौदेबाजी का मुलम्मा लगाता है तो कोई भ्रष्टाचारी तक कहता है। इन सब झंझावतों को झेलते हुए भी कलम का सिपाही अपने कर्तव्य पथ पर दिन रात एक योगी की तरह लगा रहता है। 
उत्तर प्रदेश में जंगलराज कायम है। हर तरफ हत्या,लूट,डकैती,महिलाओं के साथ उत्पीड़न व दुराचार की जघन्य घटनाएं घट रही हैं लेकिन जिम्मेदार हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।यहां कानून व्यवस्था बुरी तरह से ध्वस्त है, भ्रष्टाचार चरम पर है। फिर भी कानून के राज की बात की जा रही है। इसके पहले भी पत्रकारों के ऊपर घटनाएं घट चुकी हैं लेकिन *सरकार ने थोथी बयानबाजी के अलावा कोई भी सार्थक कदम नहीं उठाए जिससे पत्रकारों के बीच सुरक्षा का भाव पैदा हो।फतेहपुर जनपद भी पत्रकारों के उत्पीड़न से अछूता नहीं है। पत्रकारों पर हमले,फर्जी मुकदमे तो आम बात हो गई है। समाचार पत्रों के कार्यालयों से वाहन चोरी व चोरी की घटनाएं होती रहती हैं लेकिन पुलिस कभी भी उनका खुलासा नहीं कर पाती। हाल ही में सदर कोतवाली पुलिस ने एक वरिष्ठ पत्रकार के ऊपर डकैती का मुकदमा कायम किया है जबकि पत्रकार का दोष केवल इतना है कि एक महिला के हो रहे उत्पीड़न की खबर को उसने अपने समाचार पत्र में प्रकाशित किया ।नतीजतन आरोपितों ने षड़यंत्र कर पत्रकार को भी डकैत बना दिया।जब यह हालात हों तो किस न्याय की उम्मीद लगाकर आम जनता बैठे?
 समाज का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों का उत्पीड़न हो रहा है।हत्याएं हो रही हैं तो लोग अपने आप को कैसे सुरक्षित महसूस करें।कोरोना संक्रमण कॉल में जिस तरह से पत्रकारों ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन जान हथेली पर रखकर किया उसका भी सिला उन्हें नहीं दिया गया।ऐसे-ऐसे लोग कोरोना वारियर बन गए जिनका समाज सेवा से कहीं दूर-दूर तक वास्ता ही नहीं रहा लेकिन सरकार ने पत्रकारों द्वारा किए गए दुरूह कार्य पर प्रशंसा तो दूर संवेदना तक व्यक्त नहीं की। जब प्रदेश में यह हालात हो जाएं और जिम्मेदार मौन हों तो लोगों को यह सहसा एहसास कर लेना चाहिए कि हम आगे बढ़ रहे हैं पर यही उनकी नियति है। सरकारें आती-जाती रहेंगी लेकिन हालात जैसे रहे हैं उन्हीं हालातों में उन्हें जी कर समझौता करना पड़ेगा।