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प्रकृति और पर्यावरण से पुनःस्थापित हो भावनात्मक संबंध:आलोक गौड़
July 27, 2020 • ब्यूरो रिपोर्ट - न्यूज ऑफ फतेहपुर • उत्तर प्रदेश

 

विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस 28 जुलाई पर विशेष 

बिदकी फतेहपुर
प्राकृतिक अनुराग एवं विकृत संरक्षण की चिंतनधारा भारतीय संस्कृति की सर्वोपरि विशेषता है।आज विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस के अवसर पर हम सभी लोगों को संकल्प लेना चाहिए कि हम प्रकृति संरक्षण के लिए एकजुट होंगे और कारगर कदम उठाएंगे।प्रकृति  और पर्यावरण से हमे पुन:भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित करना होगा।उक्त विचार युवा विकास समिति के जिला प्रवक्ता आलोक गौड ने सँगठन द्वारा चलाये जा रहे हरियाली से खुशहाली अभियान को ध्यान मे रखते हुये विश्व प्रकृति सरक्षण दिवस पर व्यक्त किये।उन्होने कहा भारतीय ऋषि मनीषियों को प्रकृति का पारदर्शी ज्ञान था,उन्हें पर्यावरण प्रणाली का संपूर्ण एवं समग्र ज्ञान होने के कारण ही वह अधिक से अधिक पौधे लगाते थे और पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रदूषण दूर भगाने के लिए यज्ञ करते थे उन्हें प्रकृति जीव के अंतर्संबंध और इन संबंधों से उपजे परिणाम प्रभावों का पूर्ण अनुभव था, इसी कारण भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता के अन्य पद से अलंकृत किया जाता है,और इसके घटक पंच तत्वों तथा वृक्ष वनस्पतियों को देव तुल्य मानकर अभ्यर्थना की जाती है।हमारे धर्म में और हमारी संस्कृति में विभिन्न पेड़ पौधों को इसी कारण पूजा जाता है। प्रकृति और पर्यावरण की इन्हीं सब विशेषताओं के कारण ही यहां पर पर्यावरण संरक्षण और इसके विकास के प्रति जागरूकता बनी रही है,परंतु वर्तमान समय में पर्यावरण के प्रति इस भावधारा के तिरोहित होते ही शोषण और शोषकरूपी आत्मघाती मनोवृति पनपी जिसके अभिशप्त परिणाम से सभी परिचित हैं।भारतीय मनीषियों ने प्रकृति को मातृतत्व के रूप में सहज ही स्वीकारोक्ति दी है और स्वयं को इसका पुत्र मानकर ही इसकी शरण में जाते हैं।माता अपने पुत्र को आंचल में रखकर प्यार करती है।इसी कारण यहां पृथ्वी को प्रकृति का प्रतीक प्रतिनिधि मानकर "माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्याः"का भावभरा मंत्र उच्चारण किया जाता है। इसी भावोद्गार से ही हमें धरती बेजान बंजर टुकड़ा मात्र नहीं लगती।धरती हमारे लिए जीवंत प्रतिमा है और अपने प्राणों से इसका अभ्यर्थदान करते हैं।राजा जनक से लेकर चंद्रशेखर आजाद,शहीद भगत सिंह तक सभी ने इस माटी के मोल में अपना सर्वस्व दान किया है।धार्मिक कृत्यों में धरती का पूजन किया जाता है हमारी संस्कृति को अरण्य संस्कृति भी कहा जाता है। ऐसा कहने के पीछे अर्थात अरण्य तथा हरे-भरे वृक्षों के प्रति अपनी श्रद्धा एवं सम्मान रखना है।आइए प्रकृति सरक्षण दिवस पर हम सब लोग संकल्प ले की हम अधिक से अधिक पौध रोपित करेगे।