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कोरोना से ठीक होने के बाद भी भारत की बड़ी आबादी पर मंडरा रहा सांस संबंधित बीमारियों का खतरा
September 12, 2020 • ब्यूरो रिपोर्ट - न्यूज ऑफ फतेहपुर • उत्तर प्रदेश

नई दिल्‍ली,कोरोना संक्रमण ने संपूर्ण विश्व को हर तरह से प्रभावित किया है। लंबे समय से संकट बनी इस महामारी का अभी तक कोई ठोस चिकित्सीय समाधान नहीं ढूंढ़ा जा सका है। कोरोना वायरस वैसे तो शरीर के सभी अंगों को प्रभावित करता है, लेकिन इसका सबसे अधिक प्रभाव श्वसनतंत्र पर पड़ता है। इस वायरस की चपेट में सबसे पहले श्वसनतंत्र की विभिन्न कोशिकाएं आती हैं, जो इसके प्रभाव से बहुत तेजी से नष्ट होने लगती हैं। ऐसे में संक्रमित व्यक्ति को बुखार, खांसी व सांस लेने में तकलीफ होती है। जानें क्‍या कहते है पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर फिजीशियन डॉ. अशोक कुमार सिंह।

पिछले कुछ महीनों में यह देखा गया है कि 70-80 प्रतिशत लोग 10-15 दिनों में पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं, जबकि 20-30 प्रतिशत लोगों में श्वसनतंत्र की कार्यप्रणाली गंभीर रूप से प्रभावित होती है, जिसकी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। चिकित्सक चेस्ट एक्सरे और सीटी स्कैन के द्वारा यह समझ लेते हैं कि फेफड़ों में निमोनिया का कितना संक्रमण हुआ है और शरीर को कितनी ऑक्सीजन मिल पा रही है। कोरोना संक्रमित रोगियों में वायरस श्वसनतंत्र की सूक्ष्मतम कोशिकाओं को प्रभावित करके नष्ट करता है, जिससे एल्वियोली (सूक्ष्म कोशिकाएं) की कार्यक्षमता खत्म हो जाती है और ऑक्सीजन व कार्बन डाइऑक्साइड गैसों का आदान-प्रदान नहीं हो पाता है। इसे रेस्पिरेटरी फेलियर कहते हैं।

क्यों होती है पल्मोनरी फाइब्रोसिस: कोरोना वायरस से संक्रमित वे रोगी जिनमें श्वसनतंत्र की एल्वियोली कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं, उनमें काफी हद तक ऑक्सीजन एवं अन्य जीवनरक्षक प्रणाली के उपयोग से सुधार आ जाता है, लेकिन वे सामान्य स्थिति में नहीं आ पाते हैं और कोशिकाओं के नष्ट होने के कारण फेफड़ों में धब्बे बन जाते हैं। उदाहरण के तौर पर यह उसी प्रकार की प्रक्रिया है, जैसे शरीर के किसी हिस्से में चोट लगने या जलने के बाद एक निशान रह जाता है। हालांकि इसके बाद भी श्वसनतंत्र की कार्यक्षमता सामान्य रहती है।

इन लोगों को है अधिक जोखिम: कोरोना संक्रमण से श्वसनतंत्र प्रभावित होने के बाद समय के साथ इसकी कार्यप्रणाली लगभग सामान्य हो जाती है, लेकिन जो रोगी अन्य रोगों जैसे डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, मोटापा, सीओपीडी और अस्थमा से ग्रसित हैं, उनमें पल्मोनरी फाइब्रोसिस की संभावना अधिक होती है। इसके अतिरिक्त जिन लोगों की बीमारी ने गंभीर रूप अख्तियार किया हो एवं इलाज के दौरान उन्हें वेंटीलेटर आदि की आवश्यकता पड़ी हो, उनमें भी पल्मोनरी फाइब्रोसिस होने की संभावना अधिक होती है।