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कोरोना माहवारी के चलते इस वर्ष खजुहा का मेला सिर्फ परंपरा तक ही सीमित रहेगा
November 1, 2020 • ब्यूरो रिपोर्ट - न्यूज ऑफ फतेहपुर • उत्तर प्रदेश

कोरोना माहवारी के चलते इस वर्ष खजुहा का मेला सिर्फ परंपरा तक ही सीमित रहेगा

मेला की पूर्व कमेटी करेगी सहयोग  नेता देखेंगे मेले की व्यवस्था

नहीं लगेगी मीना बाजार की दुकानें

 

सोमवार को होगा राम रावण युद्ध


बिंदकी फतेहपुर
इस वर्ष ऐतिहासिक नगरी खजुहा का प्रसिद्ध मेला कोरोना कॉल के चलते सिर्फ परंपरा तक ही सीमित रहेगा मीना बाजार झूला आदि की दुकाने नहीं लगेंगी।
उत्तर भारत में प्रसिद्ध खजुहा कस्बे  का ऐतिहासिक मेला वैसे तो विजयादशमी (दशहरा) के दिन से गणेश पूजन के पश्चात शुरू हो जाता है विधि विधान से यह मेला का शुभारंभ एवं समापन होता है एक अक्टूबर  दिन रविवार को शोभायात्रा निकलेगी एवं राम रावण युद्ध सोमवार को होगा यहां की श्री राम लीला एवं मेला लगभग 525 वर्ष पुरानी परंपरा के मुताबिक आज भी होती चली आ रही है यह रामनगर बनारस के समान पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है जो भा्द पक्ष शुल्क पक्ष की तृतीया तीजा से प्रारंभ होकर कार्तिक पक्ष की षृटी से समाप्त होता है । एक माह तक कुशल कारीगरों द्वारा कास्ट एवं तिनरई आदि से विशालकाय एवं रामा दल के  स्वरूपो का निर्माण किया जाता है। विजयादशमी से 10 दिनों तक चलने वाला यह मेला विभिन्न कल्पित स्थलों जैसे पंचवटी चित्रकूट शबरी आश्रम किष्किंधा पर्वत अशोक वाटिका सेतबंधु रामेश्वर तथा लंका से समाप्त होता है।
यहां शोभायात्रा के दिन रावण की विधि विधान से श्री राम जानकी पंचायती मंदिर के पुजारी एवं मंदिर के प्रबंधक आदि हजारा आरती करते हैं यह पुरानी परंपरा आज भी चली आ रही है जिस दिन से मेले की गणेश पूजन के साथ शुरुआत होती है मंदिर के पुजारी व्रत रखते हैं रावण वध के पश्चात सरयू स्नान के साथ रावण की तेरहवीं में ब्रह्भोज भी कराया जाता है इन क्रियाओं को देखने  हेतु दूरदराज से लोग आते हैं मेले में छोटी बड़ी लगभग दो दर्जन झांकियां सजाई जाती हैं जो दर्शनीय होती हैं राम रावण युद्ध के दिन लाखों की तादाद में भीड़ होती है जिसमें प्रशासनिक अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि भी शामिल होते हैं।
परंतु इस वर्ष कोरोना माहवारी के चलते ऐसी उम्मीद नहीं है।
इस मेले में मेघनाथ जब अपनी में सत्य का प्रयोग करता है तो लक्ष्मण वास्तव में मूर्छित हो जाते हैं ।सुषैन वैद्य द्वारा बताए जाने पर जब हनुमान जी संजीवनी बूटी लाते हैं उसके बाद मंत्रोच्चारण के साथ लक्ष्मण होश में आ जाते हैं राम का करुण कँदन मेले में शोक जैसा माहौल भर देता है। इस मेले की चर्चा जिले में ही नहीं अपितु संपूर्ण उत्तर भारत में होती रही है।
मेला कमेटी के संचालक मंडल के दयाराम उत्तम मनोज कुमार गुप्ता चमन लाल गुप्ता अर्जुन तिवारी एवं मंदिर के प्रबंधक संजय ओमर के मुताबिक सभी अधिकारियों से माकूल व्यवस्था करने की अपील करते थे परंतु इस वर्ष मेला कमेटी के संचालक से कोई मतलब नहीं है इस वर्ष कारागार राज मंत्री जय कुमार जैकी एवं भाजपा विधायक करण सिंह पटेल व्यवस्था को देख रहे हैं।
  ...    खजुहा कस्बे का ऐतिहासिक परिचय सुनकर लोग चकित रह जाते हैं शासन प्रशासन की उपेक्षा के चलते इस कस्बे की साख दिन प्रतिदिन समाप्त हो रही है बिंदकी तहसील से लगभग 7 किलोमीटर दूर पर स्थित मुगल रोड आगरा मार्ग पर स्थित खजुहा कस्बे में दो विशालकाय फाटक व सराय आज भी इसकी बुलंदियां बयां करती हैं। मुगल रोड के उत्तर में 3 राम जानकी मंदिर तथा तीन विशालकाय शिवालय हैं।  दक्षिण में छिन मस्तिष्क माँ  पंथेश्वरी देवी का प्राचीन मंदिर व बंसीवाला मठ, भूरा बाबा की समाधि स्थल है। बड़ी बाजार में तीन राधा कृष्ण मंदिर हैं इस प्राचीन सांस्कृतिक नगरी में 118 छोटे बड़े शिवालय मंदिर तथा इतने ही कुऐ हैं। चार विशालकाय तालाब इस नगरी के चारों दिशाओं में शोभायमान हैं जो इस नगर के स्वर्णिम युग की याद दिलाते हैं।
            विदेशी पर्यटक आज भी इस नगरी की प्राचीनतम धरोहरों को देखने आते हैं परंतु शासन प्रशासन की उपेक्षा के चलते यह गौरवमई नगरी अपना अस्तित्व बचा पाने में असफल साबित हो रही है इस नगरी में एक ऐसी सुरंग बनी थी जिसमें राजा महाराजा घुड़सवारी कर दिल्ली तक का सफर तय करते थे।
      श्री राम जानकी मंदिर में रावण के तांबे का लगभग 4 कुंतल वजनी फिर आज भी ऐतिहासिकता का पर्याय बना हुआ है या फिर कई दशकों पहले एक बार रावण के सिर पर चढ़ाया गया था तो कई अपनी घटनाएं शुरू हो जाने से फिर कभी इसकी पुनरावृति नहीं हुई और पूर्व में इस मंदिर के पुजारी व प्रबंधक को स्वप्नन आया कि यह सिर ना चढ़ाया जाए इसकी एवज में कास्ट की लकड़ी का 10 सिर वाला विशालकाय सर बनवाया जाए और उसी को लगाया जाए तभी से यह पुरानी परंपरा चली आ रही है।
गौरतलब है कि तांबे का यह रावण का सिर पहले तो मंदिर के चबूतरे पर ही रखा रहता था कई बार चोरों ने उसे ले जाने की योजना बनाई परंतु सर को टस से मस नहीं कर सके। मुगल शासन काल से लगने वाले इस मेले में रावण के रथ का वजन लगभग 70 कुंतल वजनी होता है। जो 30 फुट की ऊंचाई में बनी लंका में रस्सो के जरिए लगभग आधा सैकड़ा लोग चढाते हैं । यह भी कम अचरज की बात नहीं है। इस ऐतिहासिक मेले की आभा देश की राजधानी तक पहुंचती रही है देश के प्रमुख समाचार पत्रों एवं इलेक्ट्रॉनिक चरणों में भी इसका सीधा प्रसारण हो चुका है यहां रावण जलाया नहीं जाता राम के हाथों पद निश्चित होता है शोभायात्रा के उपरांत रावण की हजारा दीप वाले हजारा आरती होती है इस दिन मुगल मार्ग जाम रहता है मेला ग्राउंड में चारों ओर बड़े-बड़े टीले बने हुए हैं दर्शक वहीं से बैठकर मेले का लुफ्त उठाते रहते हैं इस मेले की विशेष महत्व है जोकि इतिहास के पन्नों में भी इसका प्रमाण छुपा है।
परंतु इस वर्ष कोरोना माहवारी के चलते ऐसा मेला होना असंभव है।