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छत्तीसगढ़: बस्तर में प्रेम के आगे हथियार डाल रहा आतंक, जानें नक्सलियों के समर्पण करने की कहानी
August 29, 2020 • ब्यूरो रिपोर्ट - न्यूज ऑफ फतेहपुर • उत्तर प्रदेश

जगदलपुर,इश्क वह बला है जिसमें दुनिया बदलने की ताकत है। बड़े बड़े बादशाहों ने प्रेम की खातिर तख्तो-ताज छोड़ दिया, फिर नक्सलवाद क्या चीज है। यहां लाल आतंक पर इश्क का नशा जमकर चढ़ने लगा है।

प्रेम की खातिर लाखों के इनामी नक्सली हथियार डालकर वापस लौट रहे हैं। इस साल तो एक बहन के प्यार में भाई भी बंदूक छोड़कर घर लौट आया। इसी महीने रक्षाबंधन के ठीक पहले दंतेवाड़ा जिले के पालनार गांव में एक बहन को 14 साल बाद भाई मिला है। लिंगे का भाई मल्ला तामो 14 साल पहले नक्सली बना था। संगठन में तरक्की करते हुए वह डिप्टी कमांडर बन चुका था। सरकार ने उस पर आठ लाख का ईनाम घोषित किया था। लिंगे ने रक्षाबंधन के तोहफे में उसे सरेंडर करने को कहा। बहन के प्यार के आगे दुर्दांत नक्सली का दिल पसीज गया और उसने सरेंडर कर दिया।

इश्क की ताकत बंदूक पर भारी पड़ रही है। इसकी चर्चा इसलिए हो रही है कि अभी दो दिन पहले ही एक प्रेमी जोड़ा जंगल से भागकर पुलिस की शरण में पहुंचा है। 27 अगस्त को दंतेवाड़ा जिले में प्रेमी जोड़े हरदेश लेकाम और आसमती ने समर्पण किया। उनके साथ तीन और नक्सलियों ने समर्पण किया है जिनमें एक तो भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या में भी शामिल रहा। प्रेमी जोड़े ने सभी को प्रेम की राह दिखाई और आतंक का साथ छोड़ने के लिए मनाया। बस्तर जिले के पीड़ियाकोट गांव के हरदेश लेकाम ने बताया कि 2017 में पिता की हत्या के बाद बदला लेने के लिए वह नक्सली बना। उसकी प्रेमिका आसमती नक्सलियों के प्रचार तंत्र चेतना नाट्य मंडली की सदस्य थी। विवाह के बाद आसमती गर्भवती हुई तो नक्सली नेताआों ने उसका गर्भपात कराने को कहा। ऐसे में हरदेश ने नक्सलवाद छोड़कर होने वाले बच्चे का भविष्य बनाने की ठानी और पत्नी तथा तीन साथियों को लेकर दंतेवाड़ा एसपी डॉ. अभिषेक पल्लव के पास पहुंच गया। प्रेमी जोड़ों के जंगल से भागने से नक्सली नेता बेचैन हैं। उनकी रणनीति फेल हो रही है।

18 अगस्त 2014 को पूर्वी बस्तर डिवीजन मिलिट्री कंपनी के कमांडर संपत उर्फ सुट्टे ने प्रेम की खातिर बंदूक को तिलांजलि दे दी। यह नक्सल संगठन के लिए बड़ा झटका था। संपत को संगठन में रहते हुए आसमति से प्यार हो गया था। आसमती जंगल में नक्सलियों का इलाज करती थी। नक्सल संगठन में रहते हुए ही 2006 में उन्होंने अपने प्रेम को सार्वजनिक किया था। संगठन के नियम के अनुसार दोनों ने विवाह किया। जब दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के प्रभारी राजू उर्फ रामचंद्र रेड्डी को जब इस विवाह का पता चला तो वह नाराज हो गया। उसने संपत की नसबंदी करवा दी और दोनों को अलग रहने का फरमान सुना दिया। संपत व आसमती पर कड़ी निगरानी रखी जाती। उन्हें जंगल से भागने का मौका तलाशने में करीब छह साल लग गए। समर्पण के दौरान संपत बेहद नाराज था।