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भारत में विवाह क़ी उम्र : जानिये शारदा एक्ट क्या है और जानिए इसके विभिन्न प्रावधानों और सजा के नियमो को
August 20, 2020 • ब्यूरो रिपोर्ट - न्यूज ऑफ फतेहपुर • उत्तर प्रदेश

 

भारत में शादी करने की न्यूनतम उम्र लड़कों के लिए 21 और लड़कियों के लिए 18 साल है. बाल विवाह रोकथाम क़ानून 2006 के तहत ये उम्र तय की गई है. इससे कम उम्र में शादी ग़ैर-क़ानूनी है, जिसके लिए दो साल की सज़ा और एक लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है.

अब सरकार लड़कियों के लिए इस सीमा को बढ़ाकर 21 साल करने पर विचार कर रही है. सांसद जया जेटली की अध्यक्षता में 10 सदस्यों की टास्क फ़ोर्स का गठन किया गया है, जो इस पर अपने सुझाव जल्द ही देगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में इसका ज़िक्र किया था. उन्होंने कहा था कि लड़कियों की शादी की उम्र को लेकर समीक्षा की जा रही है.

उन्होंने बताया कि शादी के लिए सही उम्र क्या हो, इसके लिए समिति बनाई गई है, उसकी रिपोर्ट आते ही बेटियों की शादी की उम्र को लेकर सही फ़ैसला किया जाएगा.

इस मामले की शुरुआत दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका से हुई थी. वकील अश्विनी कुमार उपाध्‍याय ने एक याचिका दायर करके मांग की थी कि लड़कियों और लड़कों के लिए शादी की उम्र का क़ानूनी अंतर ख़त्‍म किया जाए.

इस याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा गया था जिस पर सरकार ने बताया कि इस विषय पर गहन विश्लेषण के लिए टास्क फ़ोर्स का गठन किया गया है.

कब बना था सारदा एक्ट?

भारत में लड़कियों की शादी की उम्र लंबे समय से बहस का विषय रही है. बाल विवाह की कुप्रथा को रोकने के लिए आज़ादी के पहले से ही कई बार शादी की उम्र में बदलाव किया गया.

मौजूदा बाल विवाह रोकथाम क़ानून की नींव जहां से पड़ी उसे सारदा एक्ट कहा जाता है. इस एक्ट में तय की गई शादी की उम्र को ही वर्तमान क़ानून का हिस्सा बनाया गया.

आज़ादी से पहले लड़कियों की कम उम्र में शादी को रोकने के लिए शादी की अलग-अलग न्यूनतम आयु सीमा तय की गई. लेकिन, इसे लेकर कोई पुख़्ता क़ानून नहीं बना था जिसकी मांग भी की जा रही थी.

लेकिन, 1927 में राय साहेब ह‍रबिलास सारदा ने बाल विवाह रोकने का विधेयक पेश किया और इसमें लड़कों के लिए न्‍यूनतम उम्र 18 और लड़कियों के लिए 14 साल करने का प्रस्‍ताव था. 1929 में यह क़ानून बना. इसे ही सारदा एक्‍ट के नाम से जाना जाता है.

हरबिलास सारदा एक शिक्षाविद, न्यायाधीश, राजनेता और समाज सुधारक थे. उनके प्रयासों से ही सारदा एक्ट बन पाया था.

इस क़ानून में 1978 में संशोधन हुआ. इसके बाद लड़कों के लिए शादी की न्‍यूनतम उम्र 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल हो गयी. मगर तब भी कम उम्र की शादियां नहीं रुकीं. साल 2006 में इसकी जगह बाल विवाह रोकथाम क़ानून लाया गया. इस क़ानून में बाल विवाह कराने वालों के विरुद्ध दंड का भी प्रावधान किया गया.

क़ानून की ख़ामियां

दिल्ली हाईकोर्ट में वक़ील सोनाली कड़वासरा कहती हैं कि सारदा एक्ट का उस वक़्त आना बहुत बड़ी बात थी. इसका विरोध करने वालों की भी कमी नहीं थी लेकिन ये क़ानून बिना दांतों वाले सांप की तरह था।

वे कहती हैं, "जब ये क़ानून आया उस वक़्त शादी की उम्र 12 साल थी. ऐसे में शादी की उम्र को बढ़ाना बहुत महत्वपूर्ण था. उस वक़्त ये क़ानून पास तो कर दिया लेकिन ब्रिटिश सरकार ने कभी भी इसका सख़्ती से पालन नहीं करवाया. प्राथमिक कारण राजनीतिक थे क्योंकि भारत में बाल विवाह की जड़ें बहुत गहरी समाई थीं।

सारदा एक्ट में बहुत कम सज़ा का प्रावधान था. इसमें 15 दिन जेल की सज़ा और एक हज़ार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकते थे. लेकिन, मौजूदा क़ानून में दो साल जेल की सज़ा और एक लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है।

सोनाली कड़वासरा बताती हैं, इसमें दूसरी समस्या ये थी कि इसमें कभी ये नहीं बताया गया कि जो शादी हुई है उसकी आगे क्या स्थिति होगी. क्या वो शादी वैध है या अवैध (शादी नहीं मानी जाएगी) या उसे रद्द किया जा सकता है. इससे नाबालिगों की शादी कराना दंडनीय अपराध तो है लेकिन शादी वैध है या नहीं इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

इस क़ानून में कमी ये भी थी कि शादी रुकवाने को लेकर कोर्ट का आदेश मिलने की प्रक्रिया का लोग फायदा उठा लेते थे. एक प्रावधान ये था कि नाबालिगों की शादी रुकवाने के लिए आप निषेधाज्ञा ले सकते हो यानी इसका आदेश कोर्ट से ले सकते हो. लेकिन, इसके लिए पहले अभियुक्त को नोटिस दिया जाएगा और उसका पक्ष सुना जाएगा. शिकायत सही साबित होने पर ही निषेधाज्ञा दी जाएगी।

इस प्रावधान की वजह ये थी कि कोई आपसी दुश्मनी की वजह से झूठी शिकायत करके क़ानून का फायदा ना उठा ले और किसी निर्दोष को शादी में मुश्किलें ना झेलनी पड़ें.

लेकिन, लोग इसका फायदा उठाते थे और कुछ प्रशासनिक परेशानियां भी थीं. जैसे शादी के बाद नोटिस मिलना या उसे देर से स्वीकार करना. इससे क़ानून ठीक से लागू नहीं हो पाता था.

इन्हीं, सभी खामियों को देखते हुए बाल विवाह रोकथाम क़ानून, 2006 लाया गया. उसमें इन कमियों को दूर करके क़ानून को और सख़्त बनाने की कोशिश की गई.

क़ानून में महत्वपूर्ण बदलाव

इसमें शादी की उम्र सारदा एक्ट के आधार पर रखी गई. इसके अलावा बाक़ी पक्षों में सुधार किया गया और ये बदलाव इतने ज़्यादा थे कि सारदा एक्ट को भंग कर दिया गया।

सज़ा की बात करें तो इस क़ानून में दो साल सज़ा और एक लाख जुर्माने का प्रावधान है. साथ ही शादी करवाने वालों और नाबालिगों की शादी की जानकारी होने पर भी शादी में शामिल होने वालों को भी इसमें सज़ा दी सकती है।

सोनाली कड़वासरा बताती हैं, "इसमें महिलाओं को सज़ा नहीं होती. चाहे वो दुल्हन हो या दूल्हा और दुल्हन की मां, बहन और अन्य महिला रिश्तेदार. ये माना जाता है कि क्योंकि महिलाओं के पास सामाजिक कारणों के चलते फ़ैसले लेने का अधिकार नहीं होता तो वो इस शादी में शामिल होने के लिए मजबूर हैं."

बाल विवाह रोकथाम क़ानून शादी की स्थिति को लेकर भी पहले से ज़्यादा स्पष्टता रखता है. क़ानून कहता है कि दूल्हा या दुल्हन इसे रद्द कराने के लिए बालिग होने पर कोर्ट में आवेदन कर सकते हैं।

इस क़ानून में पहले से बाल विवाह रुकवाने के लिए क़ानून में आपात स्थिति में बिना नोटिस के भी निषेधाज्ञा दी जा सकती है. साथ ही इसके तहत हर ज़िले में एक अधिकारी नियुक्त किया गया जिसका काम था कि नाबालिग शादियों को रोकने की दिशा में काम करना. हालांकि, अब भी ये समस्या है कि शिकायत नहीं करते और सामने नहीं आते।

अब जेंडर के आधार पर उम्र में अंतर का विरोध किया जा रहा है और लड़का व लड़की की शादी की उम्र एक समान किए जाने की मांग की जा रही है।

सोनाली कड़वासरा कहती हैं कि लड़की की उम्र को लेकर इतनी चर्चा इसलिए होती रही है क्योंकि शादी के बाद लड़की के जीवन में ज़्यादा बदलाव आते हैं. बाल विवाह के कारण उसके प्रगति के मौके ख़त्म हो जाते हैं. कम उम्र में बड़ी ज़िम्मेदारी आ जाती है. वो घरेलू हिंसा और यौन हिंसा की शिकार होती हैं क्योंकि उन्हें पता ही नहीं होता कि उनके साथ हिंसा हो रही है और इसका विरोध कर सकती हैं. साथ ही वो छोटी उम्र में मां बन जाती हैं जिससे कि उनके स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है.

लेकिन, फिलहाल सरकार शादी की उम्र में क्या बदलाव करती है या इसे बनाए रखती है, ये टास्क फोर्स की सिफारिशों के बाद ही पता चल पाएगा।