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अटूट आस्था का प्रतीक डिघरूवा का श्री बाँके बिहारी जी का मंदिर.
August 14, 2020 • ब्यूरो रिपोर्ट - न्यूज ऑफ फतेहपुर • उत्तर प्रदेश


अमौली/फतेहपुर:डिघरूवा में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की एकादशी से श्री बाँके बिहारी जी की रथयात्रा एवं ऐतिहासिक मेला अटूट आस्था का प्रतीक है|जहाँ भक्त भाव विभोर होकर दर्शन करने आते है|
जिला मुख्यालय से 50 किमी दूर दोआबा के बीच मे स्थिति ऐतिहासिक खजुहा कस्बे से अमौली रोड पर डिघरूवा गाँव मे श्री कृष्ण अष्ठमी के बाद दसमी के दिन विशाल दंगल का आयोजन किया जाता है|इसके बाद एकादशी से साक्षात विराजमान श्री बाँके बिहारी लाल जी की भव्य रथ यात्रा की शुरुवात की जाती है|मन्दिर के मुख्य पुजारी मुन्ना तिवारी की अगुवाई में श्री बाँके बिहारी जी अपने बहाल(हाथ से खींचने वाला रथ) पर सवार होते है|और गाँव भृमण के लिए निकल पड़ते है|तो पूरा गाँव गोपी बल्लभ राधे श्याम,जानकी बल्लभ सीताराम श्री बाँके बिहारी लाल जी की जय के जयघोष से गूंज उठता है|बिहारी जी के रथ के साथ नाचनहारो की टोली महिला वेश और पुरुष भेष में कृष्ण भक्ति में लीन होकर गीतो के साथ नृत्य करते हुए साथ साथ चलती है|और ग्रामवाशी अपने अपने दरवाजे पर अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण का पूजन अर्चन कर उन्हें भेंट अर्पण करके अपने उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना करते है|गांव के ही अधिवक्ता और पत्रकार पवन अवस्थी ने बताया कि बाँके बिहारी लाल जी गाँव भृमण के पश्चात त्रयोदशी के दिन डिघरूवा इंटर कालेज में अल्प विश्राम करेंगे|इसके उपरांत मुख्य पुजारी और ग्रामीण अपने आराध्य देव श्री बाँके बिहारी जी को छाती में बांधकर निकट में ही स्थिति बिहारी जी के सरोवर में स्नान कराते है|परन्तु इस वर्ष कोरोना वैश्विक महामारी के कारण आराध्य देव श्री बाँके बिहारी जी के दर्शन मंदिर परिसर में ही मात्र हो पाएंगे|महामारी को देखते हुए गांव भृमण का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है|
*पौराणिक इतिहास* 
श्री बाँके बिहारी जी के मंदिर के पौराणिक इतिहास के बारे में गाँव के ही कन्हैया लाल दुबे(सीताराम बाबा) ने बताया कि सैकड़ो वर्ष पूर्व आज जहाँ पर भव्य मन्दिर परिसर बना हुआ है|जंगल,झाड़ी हुआ करती थी|उन्ही झाड़ियों के बीच मे ग्रामीणों को एक अष्ठधातु की बिहारी जी की चमकती हुई मूर्ति दिखाई पड़ी|ग्रामीणों ने झाड़ियों की साफ सफाई के उपरांत वहीं पर बिहारी जी की मूर्ति की स्थापना कर दी|बाद में बंजारा समाज के कुछ लोग गांव में आये उन्हीने ही बिहारी जी के स्थल को मन्दिर का स्वरूप प्रदान किया|मन्दिर से जुड़ा सबसे रोचक प्रसंग ये है|कि एक बार चोर मन्दिर से बिहारी जी की मूर्ति को चुराकर लिए जा रहे थे|शिवराजपुर के पास गंगा जी मे जैसे ही चोर मूर्ति लेकर नाव में सवार हुए,नाव पलटने लगी तभी मल्लाह ने चोरो से पूछा कोई चोरी का समान तो नही लिए हो|तब चोरो ने कहा हम लोग डिघरूवा गांव से श्री बाँके बिहारी जी की मूर्ति को चुराकर लाएं है|तब मल्लाह ने कहा मूर्ति को जल में तुरन्त फेंक दो|नही तो सभी लोग जल में ही डूबकर मर जाओगे|चोरो ने भयभीत होकर तुंरत मूर्ति को गंगा जी के जल मे फेंक दिया|तदुपरांत बिहारी जी ने स्वंम मन्दिर के उस वक्त के पुजारी पोखरदास बाबा को स्वप्न्न दिया कि मैं शिवराजपुर में गंगा जी के किनारे तहलटी में पड़ा हूँ|मुझे सभी लोग ले जाओ आकर|पुजारी जी ने सभी ग्रामीणों को अपने स्वप्न्न के बारे में बताया तब सभी ग्रामीण रथ,सगढ़,रब्बा इत्यादि साधनों को सजाकर कर उस पर सवार होकर शिवराजपुर में गंगा जी के पास गए|उन्होंने देखा की गंगा के किनारे ही बिहारी जी की मूर्ति पड़ी हुई थी|ग्रामीणों ने उन्हें वहाँ से उठाकर मन्दिर में पुनः स्थापित किया|आज भी प्रतिदिन सैकड़ो की संख्या में दूर दूर से श्रद्धालुओं की भीड़ मन्दिर परिसर में लगी रहती है|लोगो की मान्यता है,कि बिहारी जी के दरबार से कोई कभी खाली हाथ नही लौटता है|पूरे जनपद में कृष्ण पक्ष की एकादशी से लगने वाले बिहारी जी के मेले का विशेष महत्व है|मेले में देश के कोने कोने से हजारों की संख्या में श्रदालुओं के आने का ताँता लगा रहता है|श्रदालुओं को किसी प्रकार की कोई दिक्कत न हो सके जिसके लिए भारी संख्या में पुलिस प्रशासन के अधिकारीगण और पीएसी बल की जवान पूरी मुस्तैदी के साथ अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद रहते है|